चम्पारन और ब्रिटिश दमन
![]() |
| भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद |
ब्रिटिश शासक के अन्याय के प्रति हमारा दब्बूपन अब विरोध में बदल रहा था। सन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ होने पर लोगों के लिये नई कठिनाइयां उत्पन्न हो गई-जैसे भारी कर, खाद्य पदार्थों की कमी कीमतों का बढ़ना और बेरोजगारी। सुधार का कोई संकेत नहीं मिल रहा था। जब कलकत्ता में सन 1917 के दिसम्बर माह में 'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी' का अधिवेशन हुआ तो भारत में उथल-पुथल मची हुई थी। राजेन्द्र प्रसाद भी इस अधिवेशन में शामिल हुए। उनके साथ ही एक सांवले रंग का दुबला-पतला आदमी बैठा था मगर उसकी आंखें बड़ी तेज और चमकीली थी। राजेन्द्र प्रसाद ने सुना था कि वह अफ़्रीका से आया है लेकिन अपने स्वाभाविक संकोच के कारण वह उससे बातचीत न कर सके । यह व्यक्ति और कोई नहीं महात्मा गांधी ही थे। वह अभी-अभी दक्षिण अफ़्रीका में सरकारी दमन के विरूद्ध संघर्ष करके भारत लौटे थे। राजेन्द्र प्रसाद को उस समय पता नहीं था कि वह सांवला पैनी आंखों वाला व्यक्ति ही उनके भविष्य के जीवन को आकार देगा।
गांधी जी ने अपना प्रथम प्रयोग बिहार के चम्पारन ज़िले में किया जहां कृषकों की दशा बहुत ही दयनीय थी। ब्रिटिश लोगों ने बहुत सारी धरती पर नील की खेती आरम्भ कर दी थी जो उनके लिये लाभदायक थी। भूखे, नंगे, कृषक किरायेदार को नील उगाने के लिये ज़बरदस्ती की जाती। यदि वे उनकी आज्ञा नहीं मानते तो उन पर जुर्माना किया जाता और क्रूरता से यातनाएं दी जाती एवं उनके खेत और घरों का नष्ट कर दिया जाता था। जब भी झगड़ा हाई कोर्ट में पेश हुआ, तब-तब वास्तव में राजेन्द्र प्रसाद ने सदा बिना फीस लिये इन कृषकों का प्रतिनिधित्व किया। लेकिन फिर भी वह निरन्तर जानवरों जैसी स्थिति में रहते आ रहे थे। गांधीजी को चम्पारन में हो रहे दमन पर विश्वास नहीं हुआ और वास्तविकता का पता लगाने वह कलकत्ता अधिवेशन के बाद स्वयं बिहार गये। महात्मा गांधी के साथ चम्पारन का एक कृषक नेता था। जो पहले उन्हें राजेन्द्र प्रसाद जी के घर पटना में ले आया। घर में केवल नौकर था। गांधीजी को एक किसान मुवक्किल समझकर उसने बड़ी रूखाई से उन्हें बाहर बैठने के लिये कहा। कुछ समय बाद गांधी जी अपनी चम्पारन की यात्रा पर चल दिये। नील कर साहब और यहां के सरकारी अधिकारियों को डर था कि गांधीजी के आने से गड़बड़ न हो जाये। इसलिये उन्हें सरकारी आदेश दिया गया कि तत्काल ज़िला छोड़ कर चलें जायें। गांधीजी ने वहां से जाने से इंकार कर दिया और उत्तर दिया कि वह आंदोलन करने नहीं आये। केवल पूछताछ से जानना चाहते हैं। बहुत बड़ी संख्या में पीड़ित किसान उनके पास अपने दुख की कहानियां लेकर आने लगे। अब उन्हें कचहरी में पेश होने के लिये कहा गया।
गांधी जी से भेंट
बाबू राजेन्द्र प्रसाद की ख़्याति कि वह बहुत समर्पित कार्यकर्ता हैं, गांधी जी के पास पहुंच चुकी थीं। गांधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद को चम्पारन की स्थिति बताते हुए एक तार भेजा और कहा कि वह तुरन्त कुछ स्वयंसेवकों को साथ लेकर वहां आ जायें। बाबू राजेन्द्र प्रसाद का गांधी जी के साथ यह पहला सम्पर्क था। वह उनके अपने जीवन में ही नहीं बल्कि भारत की राष्ट्रीयता के इतिहास में भी, एक नया मोड़ था। राजेन्द्र प्रसाद तुरन्त-फुरन्त चम्पारन पहुंचे और गांधी जी में उनकी दिलचस्पी जागी। पहली बार मिलने पर उन्हें गांधी जी की शक्ल या बातचीत किसी ने भी प्रभावित नहीं किया था। हां, वह अपने नौकर का गांधी जी से किये दुर्व्यवहार से जिसके बारे में उन्होंने सुना था, बहुत दुखी थे। उस रात गांधी जी ने जागकर वाइसरॉय और भारतीय नेताओं को पत्र लिखे और कचहरी में पेश करने के लिये अपना बयान भी लिखा। उन्होंने केवल एक बार रूक कर बाबू राजेन्द्र प्रसाद और उनके साथियों से पूछा कि यदि उन्हें जेल भेज दिया गया तो वे क्या करेंगे। एक स्वयंसेवक ने हंसते हुए कहा कि तब उनका काम भी खत्म हो जायेगा और वे सब अपने घर चले जायेंगे। इस समय इस बात ने राजेन्द्र प्रसाद जी के दिल को छू लिया और उसमें हलचल मच गई। यह एक ऐसा आदमी है जो इस प्रान्त का निवासी नहीं है और किसानों के अधिकारों के लिये जी-जान से संघर्ष कर रहा है। वह न्याय के लिये जेल जाने को भी तैयार है। और यहां हमारे जैसे 'बिहारी' जो अपने क्षेत्र के किसानों की मदद करने पर गर्व करते हैं लेकिन फिर भी हम सब घर चले जायेंगे। इस अजीबोग़रीब स्थिति ने उन्हें चौंका दिया। वह इस छोटे से आदमी को आश्चर्यचकित से ताकते रहे। जिन लोगों को वह जानते थे उनमें से किसी ने भी कभी जेल जाने तक का सपना नहीं देखा था। वकीलों के लिए जेल एक गन्दा शब्द था। जेल केवल अपराधियों के लिए था। अपराधी भी जेल की सख़्ती से बचने के लिए अधिकारियों को बड़ी-बड़ी रकमें देते थे, और यह आदमी जाने कहां से आकर जेल जाने की बात कर रहा था। उसका भी तो घर और परिवार होगा। अगली सुबह तक गांधी जी के नि:स्वार्थ उदाहरण ने बाबू राजेन्द्र प्रसाद और उनके साथियों का दिल जीत लिया था। अब वे उनके साथ जेल जाने के लिए तैयार थे। कचहरी में गांधी जी ने कहा कि उन्होंने चम्पारन छोड़ने का अधिकारियों का आदेश अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ही नहीं माना था। वह जेल जाने को तैयार हैं। बाबू राजेन्द्र प्रसाद और उनके साथी जब तक गिरफ्तार नहीं कर लिये जाते और उनका स्थान अन्य नेता नहीं ले लेते पूछताछ का काम जारी रखेंगे। उस दिन दूर-दूर के गांवों से इतने लोग कचहरी में गांधीजी को सुनने आये कि वहां का दरवाजा ही टूट गया।
सत्याग्रह की पहली विजय
यह एक चमत्कार के समान था। गांधी जी का निडरता से होकर सत्य और न्याय पर अड़े रहने से सरकार बहुत प्रभावित हुई। मुकदमा वापस ले लिया गया और वह अब पूछताछ के लिए स्वतंत्र थे। यहां तक की अधिकारियों को भी उनकी मदद करने के लिये कहा गया। यह सत्याग्रह की पहली विजय थी। स्वाधीनता संघर्ष में गांधी जी का यह महत्वपूर्ण योगदान था। सत्याग्रह ने हमें सिखाया कि निर्भय होकर दमनकारी के विरूद्ध अपने अधिकारों के लिए अहिंसात्मक तरीके से अड़े रहो। राजेन्द्र प्रसाद चम्पारन आंदोलन के दौरान गांधीजी के वफादार साथी बन गये। क़्ररीब 25,000 किसानों के बयान लिखे गये और अन्ततः यह काम उन्हें ही सौंप दिया गया। बिहार और उड़ीसा की सरकारों ने अन्ततोगत्वा इन रिपोर्टों के आधार पर एक अधिनियम पास करके चम्पारन के किसानों को लम्बे वर्षों के अन्याय से छुटकारा दिलाया। सत्याग्रह की वास्तविक सफलता लोगों के ह्रदय पर विजय थी। गांधीजी के आदर्शवाद, साहस और व्यावहारिक सक्रियता से प्रभावित होकर राजेन्द्र प्रसाद अपने पूरे जीवन के लिये उनके समर्पित अनुयायी बन गये। वह याद करते हैं, 'हमारे सारे दृष्टिकोण में परिवर्तन हो गया था...हम नये विचार, नया साहस और नया कार्यक्रम लेकर घर लौटे।' बाबू राजेन्द्र प्रसाद के ह्रदय में मानवता के लिये असीम दया थी। 'स्वार्थ से पहले सेवा' शायद यही उनके जीवन का ध्येय था। जब सन 1914 में बंगाल और बिहार के लोग बाढ़ से पीड़ित हुए तो उनकी दयालु प्रकृति लोगों की वेदना से बहुत प्रभावित हुई। उस समय वह स्वयंसेवक बन नाव में बैठकर दिन-रात पीड़ितों को भोजन और कपड़ा बांटते। रात को वह निकट के रेलवे स्टेशन पर सो जाते। इस मानवीय कार्य के लिये जैसे उनकी आत्मा भूखी थी और यहीं से उनके जीवन में निस्स्वार्थ सेवा का आरम्भ हुआ।
अस्पृश्यता का त्याग
गांधीजी के निकट संबंध के कारण उनके पुराने विचारों में एक क्रान्ति आई और वह सब चीजों को नये दृष्टिकोण से देखने लगे। उन्होंने महात्मा गांधी के मानवीय विकास और समाज सुधार कार्यों में भरसक सहायता की। उन्होंने महसूस किया, "विदेशी ताकतों का हम पर राज करने का मूल कारण हमारी कमज़ोरी और सामाजिक ढांचे में दरारें हैं।" अस्पृश्यता का अभिशाप जो प्राचीन समय से चला आ रहा था भारतीय समाज की एक ऐसी कुरीति थी जिसके द्वारा नीची जातियों को ऐसे दूर रखा जाता था मानों वे कोई छूत की बीमारी हों। उन्हें मंदिर के भीतर जाने नहीं दिया जाता था। यहां तक की गांव में कुए से पानी भी नहीं भरने देते थे। लेकिन समाज के बदलने से पहले अपने को बदलने का साहस होना चाहिये। "यह बात सच थी," राजेन्द्र प्रसाद ने स्वीकार किया, "मैं ब्राह्मण के अलावा किसी का छुआ भोजन नहीं खाता था। चम्पारन में गांधीजी ने उन्हें अपने पुराने विचारों को छोड़ देने के लिये कहा। आखिरकार उन्होंने समझाया कि जब वे साथ-साथ एक ध्येय के लेये कार्य करते हैं तो उन सबकी केवल एक जाति होती है अर्थात वे सब साथी कार्यकर्ता हैं।"
अस्पृश्यता का त्याग
गांधीजी के निकट संबंध के कारण उनके पुराने विचारों में एक क्रान्ति आई और वह सब चीजों को नये दृष्टिकोण से देखने लगे। उन्होंने महात्मा गांधी के मानवीय विकास और समाज सुधार कार्यों में भरसक सहायता की। उन्होंने महसूस किया, "विदेशी ताकतों का हम पर राज करने का मूल कारण हमारी कमज़ोरी और सामाजिक ढांचे में दरारें हैं।" अस्पृश्यता का अभिशाप जो प्राचीन समय से चला आ रहा था भारतीय समाज की एक ऐसी कुरीति थी जिसके द्वारा नीची जातियों को ऐसे दूर रखा जाता था मानों वे कोई छूत की बीमारी हों। उन्हें मंदिर के भीतर जाने नहीं दिया जाता था। यहां तक की गांव में कुए से पानी भी नहीं भरने देते थे। लेकिन समाज के बदलने से पहले अपने को बदलने का साहस होना चाहिये। "यह बात सच थी," राजेन्द्र प्रसाद ने स्वीकार किया, "मैं ब्राह्मण के अलावा किसी का छुआ भोजन नहीं खाता था। चम्पारन में गांधीजी ने उन्हें अपने पुराने विचारों को छोड़ देने के लिये कहा। आखिरकार उन्होंने समझाया कि जब वे साथ-साथ एक ध्येय के लेये कार्य करते हैं तो उन सबकी केवल एक जाति होती है अर्थात वे सब साथी कार्यकर्ता हैं।"
गाँधी जी का हरिजन आंदोलन
डा0 राजेन्द्र प्रसाद जी ने सादा जीवन अपनाया और नौकरों की संख्या कम करके एक कर दी। वह स्मरण करते हैं, "सच तो यह है कि हम सब कुछ स्वयं ही करते थे। यहां तक की अपने कमरे में झाड़ू लगाना, रसोईघर साफ करना, अपना बर्तन मांजना-धोना, अपना सामान उठाना और अब गाड़ी में भी तीसरे दर्जे में यात्रा करना अपमानजनक नहीं लगता था।" देश ने गांधी जी के हरिजन आंदोलन में बहुत उत्साह दिखाया। बिहार ने प्रतिज्ञा की कि वह इस कुरीति को और हरिजनों के कल्याण के लिये किये कार्य द्वारा हटायेंगे। दक्षिण भारत को उन्होंने "अस्पृश्यता का गढ़" कहा। राजेन्द्र प्रसाद वहां सी0 राजगोपालाचारी के साथ गये और बहुत प्रयास किया कि मंदिरों के द्वार हरिजनों के लिये खोल दिये जायें। उन्हें कुछ सफलता भी मिली। उन्होंने गांव के कुंए का उपयोग करने के अधिकार के लिए भी लड़ाई की। इस सुविधा को भी अन्य सुविधाओं के साथ स्वीकार कर लिया गया।
भूकम्प और राहत कार्य
जनवरी सन 1934 में बिहार को एक भंयकर भूकम्प ने झिंझोड़ दिया। जीवन और सम्पत्ति की बहुत हानि हुई। राजेन्द्र प्रसाद अपनी अस्वस्थता के बाद भी राहत कार्य में जुट गये। वह उन लोगों के लिये जिनके घर नष्ट हो गये थे, भोजन, कपड़ा और दवाइयां इकट्ठी करते। भूकम्प के पश्चात बिहार में बाढ़ और मलेरिया का प्रकोप हुआ। जिससे जनता की तकलीफें और भी बढ़ गई। इस भूकम्प और बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में काम करने में गांधी जी ने राजेन्द्र प्रसाद का साथ दिया। कुछ समय पश्चात उत्तर-पश्चिम में कोयटा नगर में, मई सन 1935 में भयंकर भूकम्प आया और उस क्षेत्र में भीषण विनाश लीला हुई। सरकारी प्रतिबन्धों के कारण राजेन्द्र प्रसाद तुरन्त वहां पहुंच न सके। उन्होंने पंजाब और सिंध में राहत कमेटियां बना दी जो भूकम्प द्वारा बेघर और वहां से आये लोगों को राहत देने का काम करने लगी। राजेन्द्र प्रसाद बड़ी हिम्मत से साम्प्रदायिक तनाव को कम करने, स्त्रियों की स्थिति में सुधार और गांवों में खादी और उद्योगों का विकास एवं राष्ट्र के अन्य निर्माण कार्य में लगे रहे। यह कार्य वह अपने जीवन के अंतिम दिनों तक करते रहे। उनकी मानवता आदमी के भीतर की अच्छाई को छू जाती थी।
स्वाधीनता संग्राम में
राजेन्द्र प्रसाद ने अन्य नेताओं के साथ राष्ट्र निर्माण का अति विशाल कार्य ले लिया। उस समय उनके भीतर जल रही राष्ट्रीयता की ज्वाला को कोई नहीं बुझा सकता था। राजेन्द्र प्रसाद गांधी जी के बहुत निष्ठावान अनुयायी थे। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह स्वाधीनता संग्राम के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें और पूरे भारत को गांधी के रूप में आंदोलन के लिये नया नेता और सत्याग्रह व असहयोग के रूप में एक नया अस्त्र मिला। विश्व इतिहास में ऐसा उदाहरण नहीं मिलेगा जहां इतने निरस्त्र लोग अहिंसा अपनाकर इतनी बहादुरी से लड़े हों। सत्य और न्याय के आदर्शों को धारण करके उनका ब्रिटिश शासन को हिलाने का निश्चय दृढ़ होता जा रहा था। सरकार ने अपने दमनकारी अस्त्रों से इस उत्साह को दबाने का प्रयास किया। मार्च सन 1919 में रॉलेट एक्ट पास किया गया। इसके द्वारा जज राजनैतिक मुकदमों को जूरी के बिना सुन सकते थे और संदेहास्पद राजनैतिक लोगों को बिना किसी प्रक्रिया के जेल में डाला जा सकता था। लोगों का असंतोष बढ़ता गया। गांधीजी ने पूरे देश में छ अप्रॅल सन 1919 को हड़ताल बुलाई। "सारा काम ठप्प हो गया...यहां तक की गांवों में भी किसानों ने हल एक ओर रख दिये", राजेन्द्र प्रसाद ने टिप्पणी की। लेकिन सरकार का अत्याचार बढ़ता ही गया। अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में 13 अप्रेल, 1919 में एक विरोध सभा में ढेर सारे निरस्त्र लोग मारे गये और कई घायल हुए।
